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सीमा रिज़वी के मुख से |
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हर कथा किसी समाज के विचार, विश्वास तथा रहन-सहन का आईना होती है। पंचतंत्र तथा अलिफ़-लैला की कथाएं उस युग की कल्पना शक्ति का प्रतीक हैं तो, वर्तमान हिन्दी साहित्य की कथाएं परिष्कृत विचारधारा को दर्शाती हैं; इसी प्रकार लोक कथाए ग्रामीण आंचलिक जीवन एवं विश्वासो का खुला पृष्ठ हैं। यदि यह लोक कथाएं आदिवासी परिपेक्ष्य मे जन्मी हों तो इनकी रोचकता और भी अतुलनीय हो जाती है। यहां हम बात कर रहे हैं, भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र मे स्थित, 'नागालैंड' की आदिवासी लोक कथाओं की। नागालैंड सोलह प्रमुख तथा पन्द्रह उपजनजातियों की भूमि है तथा प्रत्येक जाति की अपनी लोककथाएं हैं जो उनके विभिन्न विश्वासों को प्रकट करती हैं। साधारणत: सभी जातियों में एक समान विषयों पर, थोड़ी थोड़ी भिन्नता के साथ, कथाएं प्रचलित हैं। लोक कथाओं के सामान्य विषय हैं : जाति के उद्गम स्रोत पूर्वज, धान से चूहे का सम्बन्ध, किसी स्थान के प्रचलित नाम पड़ने का कारण आदि। प्रेम कथाओं से भी यह साहित्य अछूता नहीं है, विभिन्न जातियों की भिन्न-भिन्न प्रेम कथाएं हैं जो इनके अदृश्य शक्तियों मे विश्वास को दर्शाती हैं। सामान्यतः अधिकांश नागा लोक कथाओं का प्रमुख पात्र पशु हैं; वे मनुष्य की तरह बोल सकते हैं, व्यवहार कर सकते हैं किन्तु मनुष्य की तरह कृतघ्न, क्रूर, धोखेबाज़ नही हैं वरन् विभिन्न आदर्शों की मिसाल हैं। आइये हम सब इन कथाओं का अनन्द लें। | ||||||||||||||||||